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यही संकल्प लोकपाल विधेयक पर क्यों नहीं

Posted On: 11 Mar, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आज भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा अनुष्ठान येन केन प्रकारेण महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाना है. इसके लिए राजनीतिक दलों में मची आपा-धापी को देखकर आमजन यही समझ रहा होगा कि देश और समाज के सबसे बड़े हितैषी राजनीतिक दल और उनके पुरोधा हैं. देश को संचालित करने वाले ये दल उस समय सवालों के कटघरे में खड़े होते हैं जबकि ऐसे कोई नीति और कानून बनाने का प्रश्न खड़ा होता है जो उनके भ्रष्टाचार पर प्रभावकारी अंकुश लगाता हो.

 

बात हो रही है उस बहुप्रतिक्षित लोकपाल विधेयक की जो आधी शताब्दी से सामुहिक सहमति की बाट जोह रहा है. हर बार यही दल इस विधेयक के पारित होने में अड़चनें पैदा करते रहे हैं. ये दल अपनी सुविधानुसार किसी भी कानून को लागू करने में दिलचस्पी लेते हैं और ऐसे किसी भी मुद्दे को नहीं उठने देना चाहते जो उनकी व्यापक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाता हो.

 

प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने साठ के दशक में ही स्वीडन की तर्ज पर भारत में भी एक ऐसे तंत्र के स्थापना की सिफारिश की थी जो नेताओं और मंत्रियों के ऊपर कड़ी निगाह रखता हो. यह तंत्र जिसे लोकपाल कहा जाना था वह कैबिनेट सहित सभी सांसदों के लिए एक ऐसे प्रहरी का कार्य करता जो कि किसी और माध्यम से संभव नहीं हो पाता है.
लोकपाल विधेयक को पारित कराने की हर कोशिश हर बार नाकामयाब रही और जब-जब इस विधेयक को संसद में रखा गया उसका हश्र बुरा ही रहा.

 

अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में जब एनडीए की सरकार थी तब भी इसे पारित कराने की कवायद की गयी किंतु परिणाम वही ढाक के तीन पात रहे. हालांकि उस विधेयक में पहले के विधेयकों के सापेक्ष ज्यादा कठोर प्रावधान रखे गये थे और प्रधानमंत्री को भी उसके दायरे में लाया गया था. यूपीए के नेतृत्व वाली सरकार ने आधे-अधूरे मन से इस दिशा में कार्य करने की बात कही लेकिन नतीजा पहले जैसा ही रहा.

 

आज जिस प्रकार से लगभग सभी राजनीतिक दल महिला आरक्षण के मुद्दे पर एकमत हो चुके हैं क्या वही संकल्प लोकपाल के मसले पर भी दिख सकेगा?

 

शायद नहीं, क्योंकि लोकपाल संस्था का गठन कर वे कोई समस्या नहीं मोल लेना चाहेंगे. इन्हें अत्याधिक स्वतंत्रता का उपभोग करने की आदत लग चुकी है और वे ऐसी कोई नीति नहीं लाना चाहते जिससे उनके अवैधानिक कृत्य कानून के दायरे में आ सकें. सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों का सभी कार्य पूर्ण रूपेण पारदर्शी होना ही वास्तविक लोकतंत्र की पहचान है जबकि भारत में यह पारदर्शिता कहीं नहीं दिखती.

 

कुछ राज्यों में लोकायुक्त संस्था का गठन तो किया गया किंतु वे एक प्रकार से नख-दंत विहीन संगठन ही बन कर रह गये और अधिकांश राज्यों में लोकायुक्तों की सिफारिशों को एक कोने में ढकेल दिया जाता है. आज जबकि देश की सबसे बड़ी जरूरत है कि शासन तंत्र स्वच्छ और पारदर्शी तथा भ्रष्टाचार मुक्त हो, ऐसे में अन्य मुद्दों को सामने लाकर लोकपाल जैसे अति महत्वपूर्ण और प्राथमिकता वाले मसले को पीछे धकेल दिया गया है.

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Parshant kumar के द्वारा
April 11, 2011

I like ANNA HAZARE and his method of Gandhigiri. i think it can make better our system but the main metter is how our gov. and mr anna implements this as it should be….. Thank you.

RK के द्वारा
March 14, 2010

the main problem they will face is to loose their constituencies after 5 years. And they have to work again in some other constituency to get re-elected for another term. Now a days it has become a “Vyapaar”, Invest money in elections and get returns after becoming MP/MLA. Current “Netas” are not LEADERS but now they have become Businessmen. This new change in reservation for women will certainly bring changes in the status of women in the society and also improve Honesty in Politics in certain amount if not fully. Honesty requires some emotions in nature of a human and women are more emotional then men (I think everybody will agree with me ). Hence I feel in whatever way this bill should be passed in the parliament.

sameer Upadhyay के द्वारा
March 13, 2010

मैं बात कर रहा हु बरेली में चल रहे दंगो की. आखिर कब तक हम यु ही आपस में लड़ते मरते रहेंगे और हमारी धार्मिक भावनाओ प ये नेता लोग अपनी राजनितिक रोटी सकते रहेंगे? अज जरुरत है बस देश के विकास की परन्तु ये धर्म के नाम पे हम सिर्फ अपनों का ही नहीं बल्कि अपने देश का भी सर शर्म से नीचा कर रहे है. मैं पूछता हु उस बेकसूर जनता से क्या कोई नेता उस समय आपके आगे खड़ा होता है जब आपके परिवार को दंगे में धकेल दिया जाता है? वास्तव में बहुत दुःख पहुचता उस खुदा को, उस भगवान् को, जब उसके बन्दे और अनुयायी आपस में मर कट मचाते है. aap सभी से मेरी यही विनती है, कृपया इस घोर अनर्थ का विरोध करे और देश सेवा को सर्वोपरी रखे.

Amit kumar choube के द्वारा
March 12, 2010

This very good response from our respected members of parliament and rest public of INDIA want this attitude BUT 95 % polititian who are searching his/her econominc profit in social work are problem And Person who want to Improve Country\’s standard . RESERVATION IS EATING our future and when all people know this true , condition will not controlable, JAGO BHARAT JAGO. I AM INDIAN , I WANT MY COUNTRY AT TOP WITH H(hindu)M(Muslim)& others

    rakesh के द्वारा
    April 23, 2011

    i agree with you we must suport to anna hazare i love my india

महेश के द्वारा
March 12, 2010

अरे भई इस विधेयक को पास करवा कर नेताओं को अपने ही पैर पर कुल्हाडी थोडे न मारनी हैं……..

मनोज के द्वारा
March 12, 2010

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि इस कानून के आने के बाद नेताजन भ्रष्ताचार और घोटाले नही कर सकेंगे. और इस के दायरे में सभी नेता आएगे फिर चाहे सांसद हो या प्रधानमंत्री.


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