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दलितों की बदहाली

Posted On: 11 Feb, 2010 में

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सत्य एक होता है, सार्वभौम होता है। कम से कम एक राष्ट्र-राज्य की सीमा में तो निश्चित ही दो सत्य नहीं हो सकते। लेकिन भारत दो विरोधी सत्यों से रू-ब-रू है। संयुक्त राष्ट्र की विश्व सामाजिक स्थिति रिपोर्ट 2010 के अनुसार भारत में दलितों की स्थिति बहुत खराब है। प्रति हजार दलित बच्चों में 83 शिशु जन्म लेते ही मर जाते हैं, 119 बच्चो की मौत 5 वर्ष के भीतर हो जाती है। दलित आवश्यक वस्तुओं के उपभोग खर्च में सामान्य लोगों के उपभोग खर्च से 42 फीसदी पीछे हैं। साराश यह कि राष्ट्रीय उत्पादन और कथित सकल घरेलू उत्पाद में दलितों की भागीदारी हताशाजनक है। यह कड़वा सच अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विश्लेषण का सत्य-कथ्य है। दूसरा सत्य न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर कमेटी ने निकाला है। सच्चर कमेटी के मुताबिक भारत के मुसलमानों की स्थिति बहुत दयनीय है। वे दलितों से भी पीछे हैं। रोजगार के अभाव में भूखे हैं। केंद्र सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर कार्रवाई कर रहा है। सच्चर की रिपोर्ट का आधार मजहबी है, वोट बैंक राजनीति प्रेरित है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट राजकाज का असली आईना है। महिला सशक्तीकरण को लेकर राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष व उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के साथ-साथ संप्रग अध्यक्ष के उदाहरण दिए जाते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट में तथ्य है कि दलित महिलाएं अपने परिवार में हिंसा का शिकार होती हैं। उनका यौन शोषण और उत्पीड़न होता है, अपहरण होता है, बलात्कार होते हैं। वे वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर होती हैं। कन्याएं भू्रण हत्या की शिकार होती हैं। दलित महिलाएं अपने समुदाय के भीतर अधिकार नहीं पातीं। रिपोर्ट के अनुसार भूमि स्वामित्व के मामलों में दलितों को प्रशासनिक दिक्कतें आती हैं। वे बेदखल कर दिए जाते हैं। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों के दलित सबके साथ, सबके बराबर बैठ भी नहीं सकते। जातियां दंश देती हैं। भैस, बकरी या सुअर पालन के मामूली अनुदान बराबरी नहीं दिलाते। बेशक आरक्षण ने नौकरिया दिलाई हैं, राजनीति में पद भी मिले हैं, लेकिन इस समुदाय का नेतृत्व वास्तविक गरीब दलित की चिंता नहीं करता। वे राजनीति की मुख्यधारा से दूर हैं। वे ईसाई मिशनरियों के लिए मतांतरण का सर्वसुलभ कच्चा माल हैं। वे हिंसावादी हथियारबंद वामपंथ के लिए नरम चारा हैं।

पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार भी उन्हें मुख्यधारा में नहीं ला पाई। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से तमाम अपेक्षाएं थीं, लेकिन इस राज्य में दलित ही पुलिस उत्पीड़न, मानवाधिकार हनन व पुलिस हिरासत में हो रही मौतों का निशाना हैं। यहा निर्दोष दलितों पर गैंगेस्टर के मुकदमे हैं। दलित बहुत लंबे अर्से तक काग्रेस का वोट बैंक रहे। फिर निराश हुए, छिटक गए। राहुल गाधी ने उनके घर खाना खाने का टोटका चलाया। कायदे से काग्रेस को देश की संपदा, समाज और लोकजीवन के सभी क्षेत्रों में दलितों की हिस्सेदारी का कोई ठोस प्रोग्राम लेकर दलितों के घर जाना चाहिए था। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मद्देनजर काग्रेस को दलितों से माफी भी मागनी चाहिए कि 6-7 वर्ष के अपवाद को छोड़कर देश में काग्रेस का शासन ही रहा है। दलित अब भी दबंगों, पुलिस वालों व शोषक पूंजीपतियों के निशाने पर हैं। उनके घर खाना खाने के टोटके के बजाय उन्हें राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रों में विशेष अवसर देना ज्यादा सम्मानजनक होगा। प्रधानमंत्री जी कृपया अपने अर्थशास्त्र को दुरुस्त कीजिए। विकास दर के आकड़े फर्जी हैं। करोड़ों दलित भुखमरी के शिकार हैं, विकास योजनाएं उन्हें रोजगार, दवा और बच्चों को स्कूल भेजने लायक मजदूरी नहीं देतीं। डा. अंबेडकर ने 1936 में सवाल उठाया था, क्या आप उस हालत में भी राजनैतिक सत्ता के योग्य हैं कि जब आप उन्हें अपनी पसंद का खाना भी नहीं खाने देते?

भारतीय अर्थव्यवस्था का केंद्र विश्व व्यापार संगठन है। इस अर्थशास्त्र में बाजारू क्रूरता है। स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा महंगी है, रोटी, दाल, कपड़ा और पानी भी महंगा है। करोड़पति से अरबपति बनने के सीधे राष्ट्रीय राजमार्ग हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था एक खरब डालर हो गई, लेकिन योजना आयोग द्वारा गठित सुरेश तेंदुलकर समिति ने हाल ही में गरीबों का अनुपात 37 प्रतिशत बताया है। इस निष्कर्ष ने योजना आयोग के अपने अनुमान को भी झुठलाया है। अरबपति बढ़े हैं, लेकिन देश की कुल आबादी में वे सिर्फ 0.0001 प्रतिशत ही हैं। बावजूद इसके देश के सकल घरेलू उत्पाद के 25 प्रतिशत पर उनका कब्जा है। केंद्र द्वारा गठित अर्जुन सेन गुप्ता समिति के अनुसार 78 प्रतिशत आबादी 20 रुपए रोज पर गुजारा करती है। मनमोहन अर्थशास्त्र का परिणाम है कि 0.0001 प्रतिशत लोग सकल घरेलू उत्पाद का 25 फीसदी माल मार रहे हैं और 78 फीसदी लोग 20 रुपए रोज पर गुजारा करते हैं।

सच्चर की सिफारिश राजनीतिक थीं, तो भी उन पर अमल हुआ। रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट अलगाववादी है। केंद्र उसी दिशा में बढ़ रहा है। केंद्र बताए कि संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट पर उसका दृष्टिकोण क्या है? क्या इस रिपोर्ट के तथ्यों को लेकर केंद्र दलितों की भी वास्तविक स्थिति जानने के लिए सच्चर या रंगनाथ मिश्र जैसा कोई आयोग बनाएगा? शायद नहीं, क्योंकि दलित अब मुसलमानों की तरह थोक वोट बैंक नहीं रहे। वे जाग रहे हैं। वे अपने समाज के नेताओं का भी पुनर्मूल्याकन कर रहे हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट को यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता। देश में संवैधानिक शक्ति से लैस अनुसूचित जाति आयोग है। राष्ट्रपति इसी आयोग को इस रिपोर्ट के निष्कर्षो की समीक्षा, अध्ययन और निष्कर्ष का निर्देश दें। आयोग निर्धारित समयसीमा में दलितों की वास्तविक स्थिति का पता लगाए। सभी किस्म के आरक्षणों से हुए फायदों का भी पुनर्मूल्याकन करे। आरक्षण का लाभ उठाकर ऊंची स्थिति पा चुके दलितों के बजाय वास्तविक दलितों को फायदा पहुंचाने की कारगर योजना पर सुझाव दे।

संप्रति भारतीय राजकाज और समाज पर देश के सामने दो दृष्टिकोण हैं। एक तथ्य संकलन संयुक्त राष्ट्र का है, इसने दलितों के असली हालात का निर्मम पोस्टमार्टम किया है। दूसरा दृष्टिकोण सरकार का है। इस दृष्टिकोण में सच्चर व रंगनाथ जैसे न्यायाधीशों के वोट बैंक निष्कर्ष हैं। दोनों दृष्टिकोण चौंकाने वाले हैं। पहला एक खरब डालर की अर्थव्यवस्था वाले परिपक्व गणतंत्र में दलितों की अमानवीय स्थिति के कारण चौंकाऊ है। दूसरा अपनी तथ्यहीनता और वोट बैंक राजनीति के चलते भौचक करने वाला है कि अलगाववादी होने के बावजूद यही दृष्टिकोण केंद्र की निष्ठा भी है। लेकिन एक तीसरा तथ्य और भी चौंकाने वाला है कि हमारा राजनीतिक दलतंत्र दलितों, गरीबों के पक्ष में कोई ठोस जनअभियान क्यों नहीं चलाता। दलतंत्र बाजारवादी हिंसा के खिलाफ क्यों नहीं खड़ा होता? जातिवादी राजनीति प्रायश्चित क्यों नहीं करती? राष्ट्रवादी राजनीति परम वैभवशाली राष्ट्र के लिए आक्रामक युद्ध क्यों नहीं करती। अपने ही करोड़ों भूखे लोगों की व्यथा यह राष्ट्र अब और आगे बर्दाश्त नहीं कर सकता। डा. अंबेडकर ने ठीक कहा था कि जाति से आर्थिक क्षमता नहीं आती। जातिया एक संघ भी नहीं बनातीं। जाति ने हिंदू समाज को पूरी तरह से असंगठित, अनैतिक अवस्था में ला खड़ा किया है।

[हृदयनारायण दीक्षित: लेखक यूपी सरकार के पूर्व मंत्री हैं]

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

r m के द्वारा
February 13, 2010

बीमारी जाति पूछ कर तो नहीं आती। बुद्धि का भी जाति से लेना-देना नहीं होता। सडकें पथिक से जाति नह‍ीं पूछतीं। तो पिफर हाल और हालात के लिये जाति ही क्‍यों आधार बनाया जाता है। देश में आम लोगों और उनके सुखी, निरोग जीवन के इंतजामों की बात होनी चाहिये। जातीयता को आधार मान आखिर कब तक सर्वे, क्रियान्वयन और समीक्षा होती रहेगी।

Parveen Sundriyal के द्वारा
February 12, 2010

दलितों की सबसे बड़ी समस्या यह है की जो इनमे ऊपर उठ जाता है वो औरो को ऊपर नहीं आने देता बल्कि सिर्फ उनके नाम पर अपने हित साधता है. उदितराज व मायावती ताजे उदाहरण है. वरना इतने IAS, IPS मंत्री बनाने के बाद भी हालात में सुधार नहीं हुआ. दूसरा दलित वर्गों में मीना, जातव व रविदासी आदि कुछ जातियों ने ही ज्यादा हिस्सा मार लिया और अन्य दलितों को दबा दिया वर्ना ६० साल की सुविधा कम नहीं होती.


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