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समाज बदलने का बीड़ा

Posted On: 8 Feb, 2010 में

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भारत में वैचारिक घृणा के परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रेरित सेवा संगठन प्रांत, मजहब, सांप्रदायिक सरहदों से परे एक ऐसा सेवा-संसार रच रहे हैं, जो प्राय: समाचारपत्रों और चैनल-बहादुरों की निगाहों से ओझल रहता है। कन्याकुमारी जिले में सेवाभारती द्वारा तीन हजार महिला स्वयंसहायता समूह चलाए जा रहे हैं। पूरे भारत में पाच हजार आरोग्यरक्षक काम कर रहे हैं, जो वेतन नहीं लेते। वे अपने-अपने व्यवसाय से जीविकोपार्जन करते हुए भी आपातकालीन मेडिकल सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। पश्चिम में प्रचलित ‘बेयर फुट डाक्टर्स’ का ही भारतीय रूपांतरण हैं ये।

1966 में महाराष्ट्र का लातूर क्षेत्र निपट देहात था। वहा डा. अशोक कुकडे जब एमएस करने के बाद पहुंचे तो पाया कि ग्रामीणों के लिए डाक्टरी सहायता ना के बराबर है। उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर विवेकानंद अस्पताल खोला जो न केवल आज पूरे इलाके का सर्वश्रेष्ठ 120 बिस्तर वाला सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल है, बल्कि भारत सरकार द्वारा पोस्ट ग्रेजुएट डाक्टरी शिक्षण के केंद्र के नाते मान्य भी किया गया है। डा. अशोक कुकडे पाच प्रांतों के संघचालक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यकारिणी के सदस्य हैं। औरंगाबाद में डा. हेडगेवार रुग्णालय तो गजब है। इसकी स्थापना 1989 में डा. हेडगेवार जन्मशती के अवसर पर की गई थी। वहा डा. तुपकरी और डा. दिवाकर कुलकर्णी जैसे ख्यातनाम सर्जन और विशेषज्ञ हैं। यह 150 बिस्तर वाला अस्पताल आधुनिकतम चिकित्सा सुविधाओं से लैस है। यह चिकित्सालय डा. अंबेडकर प्रतिष्ठान नामक ट्रस्ट चलाता है। ऐसा ही चिकित्सालय नासिक में गुरुजी के नाम पर स्थापित किया गया है। देश में ऐसे 31 चिकित्सालय चल रहे हैं।

पिछले सप्ताह पुणे गया तो वहा किसानों के बीच काम कर रहे मोहन घैसास से मिलना हुआ। वे ‘सुयश’ नामक संस्था के माध्यम से ऐसे 168 किसान समूह चला रहे हैं, जिनसे किसान बेहतर आय और अधिक फसल प्राप्त कर पा रहे हैं। वहीं ‘सेवाव‌िर्द्धनी’ नामक संस्था सक्रिय है जिसके प्रमुख रवींद्र वंजार वाडकर हैं। वह कुछ समय पहले तक जिला कलेक्टर थे, पर सेवाकार्य में अधिकतम समय देने के लिए आईएएस छोड़कर ‘सेवाव‌िर्द्धनी’ के काम में जुट गए। वहीं क्षिप्रा वैद्य से भेंट हुई। वह पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की छात्र नेता थीं। विवाह के बाद उन्होंने विशेष बुद्धि बालकों के मध्य काम शुरू किया। जिन ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और पिछड़ेपन के कारण बच्चे स्कूली शिक्षा नहीं ले पाते, उनके बीच साक्षरता ले जाने का काम एकल विद्यालय आंदोलन अभूतपूर्व ढंग से कर रहा है। इसके 27,041 केंद्रों में 7,53,123 छात्र शिक्षा पा रहे हैं। इस आंदोलन में योगदान देने वाले विशेषज्ञों में अनिल वर्तक भी हैं। वे आईआईटी पवई से एमटेक हैं। वह 1.59 लाख सेवा प्रकल्पों के संयोजन और इंजीनियर सेवा कार्य के संयोजक श्याम पराडे के साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं। इन लोगों के सीने में धधकती आग इन्हें समाज सुधार के काम से जोड़े हुए है। कृपा प्रसाद सिंह विज्ञान के मेधावी छात्र थे, पर जुटे रहे वनवासी क्षेत्र में। आज जगदेवराम उराव जैसे अनेक व्याख्याता 14 हजार प्रकल्प चला रहे हैं। एकनाथ रानाडे जैसे मनीषी द्वारा स्थापित विवेकानंद केंद्र पूर्वाचल में राष्ट्रीयता का श्रेष्ठ शिक्षा अभियान तो चला ही रहा है, देशभर में सेवाव्रतियों का तानाबाना भी उसने स्थापित किया, जिसे निवेदिता भिड़े जैसी शिक्षाशास्त्री देख रही हैं। राष्ट्रीय सेवाभारती द्वारा पौने दो लाख ऐसे प्रकल्प चलाए जा रहे हैं। यदि औपचारिक शिक्षा का क्षेत्र लें तो विद्याभारती ने 25 हजार विद्यालयों में 25 लाख छात्राओं को शिक्षा देते हुए की‌िर्त्तमान रचा है। नानाजी देशमुख द्वारा चित्रकूट में ग्रामीण विकास का अभिनव प्रयोग दुनियाभर में विकास, संस्कार एवं सामाजिक सहभागिता का आंदोलन बन चुका है।

देशभर में फैले ये संगठन हिंदू-मुस्लिम-ईसाई समस्त भारतीयों की समानरूपेण निश्छल प्रेम से सेवा कर रहे हैं। विडंबना है कि विश्व में सबसे ज्यादा प्रामाणिक सेवाकायरें का असाधारण संचालन करने वाले संगठन पर वैचारिक दृष्टिहीनता के शिकार सेकुलर मिथ्या आरोप लगाते हैं। आज आरएसएस के सेवा संगठन स्वामी विवेकानंद के आदशरें को क्रियान्वित करते दिख रहे हैं तो विनम्रता से इस सर्वजनहिताय कार्य की सदाशयता स्वीकार करनी चाहिए।

[तरुण विजय: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Mahesh के द्वारा
February 8, 2010

तरुण जी, आपके लिख को पढ़ कर वाकई अहसास हो गया की कहीं न कहीं आज भी मानवता जीवित है और ऐसे लोग जो बिना किसी लालच के दूसरों की सेवा करते है वह असल जिंदगी में भी होते है.


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