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कठिन समय के संकेत

Posted On 30 Jan, 2010 बिज़नेस कोच में

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नए वर्ष का पहला माह एक कठिन वर्ष के संकेत दे रहा है। वैश्विक एजेंडे में ग्लोबल वार्रि्मग का मुद्दा सबसे ऊपर है। पर्यावरण परिवर्तन पर कोपेनहेगन सम्मेलन की विफलता के बावजूद इस जटिल मुद्दे पर लोगों की जागरूकता इस स्तर पर पहुंच गई है कि कुछ सकारात्मक कदम अनिवार्य हो गए हैं। मौसम में असाधारण परिवर्तन देखने को मिल रहा है। अपने देश में सर्दी ने अपना असर दिखाया तो यूरोप बर्फ से ढक गया। भारत में कोहरे ने न जाने कितने विमानों और ट्रेनों को प्रभावित किया। कुल मिलाकर कोहरे ने आवागमन एक प्रकार से प्रतिबंधित कर दिया। हो सकता है कि हमें रोज के मौसम का अनुमान लगाने के लिए किसी ज्योतिषी की जरूरत पड़े। दुनिया ने इस पर राहत की सांस ली है कि 2035 तक हिमालय के ग्लेशियर पिघलने संबंधी रपट झूठी साबित हुई। इस प्रकरण से जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल और उसके अध्यक्ष आरके पचौरी की प्रतिष्ठा को आघात ही लगा। पचौरी ने इस भारी गफलत के संदर्भ में जो जवाब दिया उससे तो संयुक्त राष्ट्र की इस महत्वपूर्ण संस्था के अध्यक्ष पद पर बने रहने की उनकी काबिलियत पर ही संदेह खड़ा हो गया। अब इस बारे में 193 देशों को निर्णय करना है। हम सभी यह जानना चाहते हैं कि जो त्रुटि हुई वह निहित स्वार्थवश कहींकुछ लोगों द्वारा जानबूझकर तो नहीं की गई।

2009 में हमें खराब मानसून के कारण कठिन समय का सामना करना पड़ा और इस साल के पहले माह में मौसम का जो व्यहार रहा है उससे इस साल मानसून के संदर्भ में कोई भविष्यवाणी करना मुश्किल है। चुनौती का सामना करने के लिए सभी स्तरों पर तात्कालिक कदमों की आवश्यकता है। पिछले साठ वर्र्षो में सिंचाई सुविधाओं का दायरा बढ़ाने में हमने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन हम अभी भी कृषि के लिए काफी कुछ मानसून पर निर्भर हैं। विकास दर को बनाए रखने, खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने और महंगाई को काबू करने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता है। सरकार द्वारा किए गए प्रयासों और व्यावसायिक संगठनों की पहल के साथ-साथ हमें बहुत कुछ अपने स्तर पर करना है। मुझे पूरा यकीन है कि वित्त मंत्री इस बार के बजट में ग्रीन टेक्नालाजी के क्षेत्र में की जाने वाली पहल के लिए पर्याप्त धन की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे। ऊर्जा और जल संरक्षण दो महत्वपूर्ण मुद्दे हो सकते हैं। अब समय आ गया है कि हम सभी लोग व्यक्तिगत स्तर पर ऊर्जा और जल संरक्षण के क्षेत्र में अपना योगदान देने की पहल करें। आने वाले समय में हमें सौर ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा के अनेकविकल्पों के संदर्भ में सुनने को मिलेगा। इसी प्रकार वर्षा जल संचयन की तकनीक निकट भंविष्य में एक अनिवार्य व्यवस्था हो सकती है।

भारत के आर्थिक विकास के लिए वर्ष 2010 बहुत महत्वपूर्ण है। आंतरिक सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और पाकिस्तान के अस्थिर हालात जैसी चुनौतियों के सामने साढ़े सात और आठ प्रतिशत की विकास दर बनाए रखना जरूरी है। तभी हम अपने उद्देश्य को पूरा कर सकते हैं। आने वाले वर्र्षो के लिए टिकाऊ ऊंची विकास दर जरूरी है। इसी के जरिए हम गरीबी उन्मूलन जैसे सामाजिक लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। हम अक्सर विशाल घरेलू खपत के बारे में सुनते हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक सकारात्मक पहलू है, लेनिक यह हमारे वैश्विक हितों का स्थानापन्न नहीं हो सकती। हमें हरसंभव तरीके से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की जरूरत है। विश्व बैंक और आईएमएफ सरीखी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के मिलकर भारत को एक मजबूत और विश्वसनीय साझेदारी स्थापित करनी है। भारत को अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अपनी सहभागिता के स्तर को भी बढ़ाना होगा। अपने हितों की पूर्ति के लिए भारत को सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को इन संस्थाओं में भेजना होगा। बदलाव कभी आसान नहीं होता। भारत की राह में अस्थायी बाधाएं भी खड़ी होंगी, क्योंकि विकसित देश अपने बैंकों और वित्तीय संस्थानों में सुधार की कवायद करेंगे। इसके अतिरिक्त उनकी ओर से अपने कर्र्जो को घटाने तथा बेरोजगारी की दर में कमी लाने की कवायद भी की जा सकती है। विकसित देशों की कोशिश विकास की अपनी रफ्तार को बनाए रखने की है, जबकि भारत को मुद्रास्फीति की ऊंची दर से निपटना है। इसके लिए भारत को अल्पकालिक तौर पर तरलता को नियंत्रित करने की पहल करनी पड़ सकती है। इससे शेयर बाजारों का वित्तीय संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।

[अरुण नेहरू: लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं]

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रदीप के द्वारा
February 10, 2010

2010 अपने साथ कई परेशानियां लेकर आयाहै , हैती का भुकंप , दूनिया भर में फैली ग्लॉबल वॉमिंग और महंगाई के साथ इंसान का परिस्थियों से मुकाबला करने की हद पार हो रही है .


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