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न्यायिक तंत्र का सफर

Posted On: 27 Jan, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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बीते छह दशकों में न्यायपालिका ने भारतीय समाज पर अमिट छाप छोड़ी है। आम आदमी की आवाज को स्वर दिया है। उसकी आकाक्षाओं को पूरा करने का माध्यम बनी है तथा उसे गरिमापूर्वक जीवन जीने का परिवेश निर्मित किया है। आजादी के बाद सरकार ने जमींदारी उन्मूलन कानून बनाया था। प्रभावशाली भूपतियों ने इसे अदालत में चुनौती दी। कामेश्वर सिंह बनाम बिहार राज्य तथा इसी तरह के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने जमींदारी उन्मूलन कानूनों को संविधानसम्मत घोषित किया। सर्वोच्च न्यायालय ने सन 1967 में गोलकनाथ के मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। इसमें अदालत ने संसद के संविधान संशोधन के अधिकार पर प्रश्नचिह्नं लगा दिया।

1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की तेरह न्यायाधीशों की पीठ ने अपने संवैधानिक रुख में संशोधन करते हुए कहा कि संविधान संशोधन के अधिकार पर एकमात्र प्रतिबंध यह है कि इसके माध्यम से संविधान के मूल ढांचे को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद यह सिद्धांत अभी भी कायम है और जल्दबाजी में किए जाने वाले संशोधनों पर अंकुश के रूप में कार्य कर रहा है। आपातकाल के बाद के वषरें में एक नई न्यायिक परंपरा की शुरुआत हुई जिसे लोकहितवाद के नाम से जाना जाता है। इसके माध्यम से ऐसे कई क्षेत्रों में न्यायिक पहल की गई जिससे आम जनता को बहु प्रतीक्षित न्याय मिला। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में पिछले पच्चीस वषरें में हुए सुधारों का पूरा श्रेय न्यायपालिका को जाता है। इसके अलावा महिलाओं के सम्मान की रक्षा, उनके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार, बंधुआ मजदूरों की मुक्ति और बाल मजदूरों के शिक्षण तथा उनकी दशा सुधारने जैसे अनगिनत क्षेत्रों में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। इतना ही नहीं ऐसे कई मामले भी आए जिनमें अदालती निर्णयरें का दबाव इस सीमा तक पड़ा कि संसद को कानून बनाना पड़ा। शिक्षा को मूल अधिकार का दर्जा दिया जाना, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन करके प्रत्याशियों के बारे में जानकारी दिए जाने की अनिवार्य बनाना तथा सूचना अधिकार कानून के निर्माण की सार्थक पहल न्यायपालिका की ओर से ही हुई।

न्यायपालिका की गौरवगाथा के बीच यह भी सच है कि न्यायाधीशों में भी मानवीय दुर्गुण हो सकते हैं, वे मोहग्रस्त हो सकते हैं, सत्ता या अन्य लौकिक आकर्षण उन्हें अपने जाल में फंसा सकते हैं। कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दिनकरन पर पद के दुरुपयोग के गंभीर मामले हैं। उन्हें हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। आश्चर्य तो यह है कि इन सभी तथ्यों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के कालेजियम ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनाए जाने के लिए चयनित कर लिया था। कुछ सुधी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता उनसे जुड़े तथ्यों को को उजागर करने की हिम्मत नहीं दिखाते तो संभव था कि वह इस समय सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश होते। इसके अलावा कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन पर महाभियोग की कार्यवाही एक साल से लंबित है। फिर भी वह उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में सभी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं।

कुछ और घटनाएं भी घटी हैं, जिनसे न्यायाधीशों की नैतिक श्रेष्ठता को गंभीर आघात लगा है। आम आदमी की भावनाओं को यह जानकर भी ठेस पहुंची है कि उच्च पदस्थ न्यायाधीश अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करने में आनाकानी कर रहे हैं और उसे अपनी हेठी मानते हैं। आमजन को यह भी बहुत अजीब लगता है कि न्यायपालिका अपने को सूचना के अधिकार के दायरे से अलग क्यों रखना चाहती है। अदालतों में लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या ने भी न्यायालय की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई है। देश की अदालतों में तीन करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं।

अपनी गरिमा को बचाने के लिए पहल न्यायपालिका को ही करनी होगी। उसे अपनी कमियों के आकलन की संस्कृति विकसित करनी होगी। अपने को मानवेतर मानकर कानून से परे रखने के मोह से उबरना होगा। चयन प्रक्रिया और सत्यनिष्ठा से जुड़े हुए मामलों को पारदर्शी बनाना होगा। बात-बात पर अदालती अवमानना के विशेषाधिकार के दुरुपयोग पर अंकुश लगाना होगा। समालोचना को प्रोत्साहित करने की संस्कृति विकसित करनी होगी तथा आत्म-परिष्करण का परिवेश तैयार करना होगा। लोक जीवन में दोहरे मापदंड लंबे समय तक नहीं चल पाते।

[हरबंश दीक्षित: लेखक विधि मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sushma Gupta के द्वारा
November 22, 2012

माननीय दीक्षित जी,आपने यह सत्य कहा है आज नियालयों से जुडी चयन-प्रक्रियाओं एवं सत्य निष्ठाओं से जुड़े मामलों को पारदर्शी बनाना होगा,तभी उनका औचित्य है …

Vats के द्वारा
January 27, 2010

हरबंश दीक्षित जी, यह सत्य है कि उच्चतम न्यायालय और अन्य संस्थाओं के लिए दोहरे मानदंड नहीं होने चाहिए. लोक जीवन में दोहरे मापदंड विरोधाभास पैदा करते हैं.


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