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चीन की एक और चालाकी

Posted On: 16 Jan, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अगर ये खबरें सही हैं कि लद्दाख के पास चीन ने इंच-इंच करके पिछले दस सालों में कई एकड़ भूमि हथिया ली है तो यह एक गंभीर मामला है और चीन के साथ हमें इस मुद्दे को पूरे जोर से उठाना चाहिए। चूंकि यह काम धीरे-धीरे चालाकी से और चुपके से किया गया है इसलिए हमारी सेनाओं को इसका अंदाजा नहीं लगा होगा। मैं लद्दाख में चीनी सीमा पर गया हूं और सर्दियों के माहौल में सेनाओं के लिए तमाम जगहों पर लगातार तैनात रहना मुश्किल हो जाता है। हो सकता है उसका फायदा लेकर कुछ एकड़ भूमि चीन ने हथिया ली हो। अभी तक भारत सरकार की तरफ से इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर सरकार, गृहमंत्रालय और सेना के अधिकारियों के बीच हुई एक बैठक में इस आशय की किसी रिपोर्ट पर चर्चा हुई है। यह रिपोर्ट कितनी तथ्यपरक है, यह अभी तय होना बाकी है।
भारत-चीन के बीच सीमा विवाद अरसे से चला आ रहा है, जिसमें कई सीमाओं पर दोनों तरफ से दावे और प्रतिदावे हैं। जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार चीन गए थे तो सीमा विवाद हल के लिए उन्होंने कारगर कदम की पेशकश की थी। उस वक्त एक आयोग भी बनाने की बात हुई थी, जो दोनों तरफ के दावों को देखकर कोई निर्णय ले सकेगा। दुर्भाग्य से उसके बाद इस दिशा में बहुत ज्यादा प्रगति नहीं हो सकी। लद्दाख का इलाका जबरदस्त ठंड का शिकार होता है। यहां हमेशा शून्य से 15 से 25 डिग्री तापमान नीचे रहता है। इन कठिन हालात में भी हमारे वीर जवान वहां डटे रहते हैं। तमाम जवानों के शरीर के कई अंग बर्फ की वजह से नष्ट हो जाते हैं। कई इलाकों में छह महीने की तैनाती की जाती है। छह महीने तक ये जवान और अफसर वहां से वापस नहीं आ सकते हैं, क्योंकि पूरा इलाका बर्फ से ढक जाता है। ये अपने लिए छह महीने का भोजन डब्बों में ले जाते हैं। छह महीने तक लगातार सिर्फ बर्फ में रहने से न केवल इन्हें कई बीमारियां हो जाती हैं, बल्कि सबसे बड़ा खतरा कलर ब्लाइंड होने का रहता है। चूंकि छह महीने तक इन्हें सफेद रंग की बर्फ के अलावा कुछ दिखता नहीं है इसलिए जब वे लौट के आते हैं तो आंखें अन्य रंगों को नहीं देख पाती हैं। यह खतरनाक बीमारी होती है। चीनी सेना सर्दियों में लद्दाख इलाके में अपनी सीमाएं छोड़कर चली जाती है तथा गर्मियां शुरू होने के बाद वापस आती हैं। अतीत में इस तरह के कई सुझाव भारत सरकार की ओर से सामने भी आए थे कि सर्दियों में हमें अपनी सेनाओं को बर्फीले इलाकों से वापस बुला लेना चाहिए। इस मामले में दोनों तरफ के रक्षा मंत्रालयों में सहमति बननी थी, जो अभी तक नहीं बन पाई है। भारतीय सैनिक अधिकारियों को यह भय भी सताता है कि यदि वे वापस आए तो चीन धोखे से उनकी जमीन को हथिया सकता है, जबकि सर्दियों में चीन की सेना के वापस जाने के बावजूद भारतीय सेनाएं कभी कोई ऐसा गलत काम नहीं करती हैं। चीनी सेना के रुख के बारे में किसी को कोई भरोसा नहीं है। यह संभव है कि चीनी सेना की मौजूदगी न देखकर स्वाभाविक है कि हमारे सैनिक भी कुछ सतर्कता में नरम पड़ गए हों और चुपचाप चीन ने इंच-इंच करके कई एकड़ भूमि पिछले दस सालों में दबा ली हो। हालांकि अभी तक सच्चाई का पता नहीं है। यह चीनी फितरत का कमाल हो सकता है। एक तरफ तो उसका ताइवान से झगड़ा चल रहा है, जापान से नरम-गरम रिश्ते रहते हैं और भारत से भी सीमा विवाद को लेकर तकरार चलती रहती है। पाकिस्तान ने बेवजह भारत विरोध के कारण चीन को अपने यहां खुली छूट दे रखी है।
चीन विभिन्न परियोजनाओं के बहाने पाकिस्तान की जमीन जमकर हथिया रहा है, मगर अभी पाक प्रशासक आंख मूंदकर बैठे हुए हैं। जैसी छूट उन्होंने पहले अमेरिका को दी और अब अमेरिका को कोस रहे हैं उसी तरह किसी दिन चीन के लिए भी पाकिस्तानी अपना दुखड़ा रोते घूमेंगे। यह अच्छा है कि भारतीय अधिकारियों ने अभी से ही चीन सेना के नापाक इरादों को भांप लिया और अब इस दिशा में वे और सतर्कता से काम लेंगे तथा चीन के मंसूबों को नाकाम कर देंगे। भारत सरकार भी निश्चित रूप से इस मामले को पुरजोर तरीके से बीजिंग में उठाएगी। लद्दाख सीमा ही नहीं, चीन तो लगातार अरुणाचल प्रदेश पर भी अपना गैरकानूनी दावा ठोंकता रहता है। अब से तीन साल पहले नवंबर 2006 में चीन के राजदूत ने एक बेतुका बयान दिया था। दुर्भाग्य से वह बयान चीन के राष्ट्रपति के भारत आने के पहले दिया गया था। हालांकि चीन सरकार ने उस समय उसको ठंडा कर दिया था, लेकिन राजदूत ने अपनी बात जबरन रखी थी।
चीन सरकार ने इस बयान की गंभीरता को समझते हुए राजदूत के कथन से अपना पल्ला झाड़ा था कि उनको राजदूत के बयान की कोई जानकारी नहीं है और चीन सरकार का स्पष्ट मत है कि दोनों देश आपसी बातचीत से सीमाओं के बारे में भी जो पुराने विवाद हैं उन्हें सुलझा लेंगे। इस बयान पर भारत को भी कोई आपत्ति नहीं थी। पिछले पंद्रह साल में जितने भारतीय प्रधानमंत्री चीन की यात्रा पर गए या चीन से जितने भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति आए, सबने इसी वाक्य को दोहराया और आधिकारिक स्तर पर इस दिशा में काम भी चल रहा है। ऐसे अवसर पर चीन के राजदूत द्वारा दिया गया यह बेतुका बयान उनका बचकानापन साबित करता था। उन्हें यह पता नहीं है कि यदि वे इतिहास को कुरेदने की कोशिश करेंगे तो हमारे नाखून भी इतिहास को उसी तरह कुरेदना जानते हैं। फिर मकमहोन रेखा की भी बात होगी और कश्मीर का वह हिस्सा जो पाकिस्तान ने उन्हें गैरकानूनी तरीके से सौंप दिया है उसकी बात भी होनी चाहिए। राजदूत को ऐसी नादानी करने के पहले उसके परिणामों की ओर भी ध्यान देना चाहिए था। तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी का बयान उस समय एकदम सही था कि अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अटूट अंग है और हमेशा बना रहेगा।
समझ में नहीं आता है कि जहां पिछले एक दशक से चीन सरकार का एजेंडा बदल चुका है वहीं अभी तक उनके पास ऐसे कुछ कूटनीतिज्ञ बैठे हैं जिन्हें अपनी सरकार की प्राथमिकताओं के बारे में भी जानकारी नहीं है। चीन की सरकार की नीति बदल चुकी है, प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं और काम का तौर-तरीका बदल चुका है। अब चीन टकराव के रास्ते पर चलने पर विश्वास नहीं रखता है, उसका तो एकमात्र ध्येय आर्थिक प्रगति हो गई है। वह सीमा पर टकराव या दूसरे देशों से टकराव के बजाय सिर्फ आर्थिक प्रगति की ओर देख रहा है, इसीलिए चीन के लोग पूरे विश्व से अच्छे संबंध बनाने की फिराक में रहते हैं। मुझे विश्वास है कि लद्दाख के मामले में भी चीन सरकार तत्काल कदम उठाएगी और यदि कोई भूमि उसने भारत की ली है तो उसे तत्काल वापस करेगा। भारत के पास भी एक कारगर उपाय है। यदि चीन हठधर्मिता करता है तो भारत उसका सामान खरीदना बंद कर सकता है। इससे बीजिंग को झटका लग सकता है, लेकिन भारत सरकार और यहां के लोग ऐसा करना उचित नहीं समझते हैं।

[राजीव शुक्ला: लेखक कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य हैं]

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vats के द्वारा
January 16, 2010

राजीव शुक्ला जी, चीन की हड़प नीति से हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है. सरकार को भले ही भूमंडलीकरण की नीति के तहत आर्थिक क्षेत्र में उदार होना ही चाहिए किन्तु रक्षा -प्रतिरक्षा के लिहाज से सख्त पालिसी अडाप्ट करना समय की मांग है.

    anil sharma के द्वारा
    July 30, 2010

    Dear Sir, you are very good day dreamer. keep it up we like it.


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